क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर सवाल!

जागृत टीम

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक बार फिर क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर सवाल खड़ा किया है। उन्होंने इसी तरह का बयान 31 जुलाई 2022 को दिया था। इस पर भाजपा नेतृत्व वाले राजग में शामिल जदयू ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके अलावा राजद और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने चारों ओर से भाजपा पर हमला बोला था।

जेपी नड्डा का वह बयान भाजपा को कितना महंगा पड़ा था, इसका अंदाज़ा वही लोग लगा सकते हैं नीतीश कुमार की एनडीए सरकार में सत्ता के भागीदारी थे। याद रहे कि भाजपा अध्यक्ष के बयान के दसवें दिन ही बिहार में सत्ता बदल गई थी।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़ कर राजद, कांग्रेस, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा तथा वामदलों के साथ मिल कर महागठबंधन की सरकार बनाई थी।

नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ कर महागठबंधन में शामिल होने का असर आहिस्ता आहिस्ता नहीं बल्कि बड़ी तेजी के साथ पूरे देश की राजनीति पर पड़ा। यहां तक कि 26 दलों का देशव्यापी इंडिया गठबंधन बन गया। इससे परेशान भाजपा के छोटे बड़े नेता लगातार नीतीश कुमार को निशाना बना रहे हैं। वे कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा और एनडीए के दरवाजे बंद हो गए। जेपी नड्डा द्वारा क्षेत्रीय दलों के समाप्त हो जाने की बात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि वे छोटे दल जो भाजपा के साथ एनडीए में जुड़े हैं या वापस आए हैं, उनके भविष्य का क्या होगा? खास तौर से उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी अब भाजपा के साथ कितना सहज महसूस कर रहे होंगे। यही सवाल चिराग पासवान और पशुपति पारस के मन में भी उठ रहा होगा। राजद सांसद मनोज झा के ठाकुर वाले बयान पर आनंद मोहन और उनके बेटे तथा राजद विधायक चेतन आनंद की पांच छ: दिन बाद आई प्रतिक्रिया को समझना अब और भी कठिन हो गया है।

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