नीतीश मंत्रिमंडल पर हंगामा क्यों है ?

पटना। एनडीए की सरकार बन गई है। इसके मुखिया नीतीश कुमार ही बनाए गए हैं। नीतीश मंत्रिमंडल में कोई मुसलमान नहीं है। मीडिया और जनता के एक बड़े वर्ग में बहस इस बात पर हो रही है कि नीतीश कुमार के मंत्रीमंडल में कोई अल्पसंख्यक और खास तौर से मुस्लिम समुदाय से आने वाला व्यक्ति क्यों नहीं है।

दलील

नीतीश मंत्रिमंडल में मुस्लिम समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति को शामिल नहीं करने के पक्ष में कुछ लोग यह दलील दे रहे हैं कि जब मुसलमानों ने उन्हें वोट ही नहीं दिया तो फिर सत्ता में हिस्सेदारी कैसे मिलेगी। गौर से देखा जाए तो यह दलील लोकतांत्रिक व्यवस्था और खुद नीतीश कुमार का अपमान है। क्या किसी समुदाय विशेष को सरकार में प्रतिनिधित्व देने के लिए यह शर्त है कि उस समुदाय से कोई नेता चुनाव जीत कर आए? अगर यही शर्त है तो जदयू के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौधरी को मंत्री पद नहीं मिलना चाहिए था। इसके दो कारण हैं। एक तो वे चुनाव जीत कर नहीं आए, और दूसरे यह कि अपनी पार्टी को ज्यादा सीटें नहीं दिला पाए।

जनता का अधिकार

चुनाव में जनता अपना मत दान करती है। वह जिस को चाहे मतदान करे। यदि उसके मत से किसी पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं जीत पाए तो मतदाता को दोषी करार नहीं दिया जा सकता और न ही उसे सत्ता में भागीदारी से वंचित किया जा सकता है। खास तौर से तब जब सरकार के पास उस समुदाय को प्रतिनिधित्व देने का दूसरा विकल्प भी हो। बिहार में विधान सभा के साथ ही विधान परिषद भी है। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधान परिषद ही के सदस्य हैं।

दूसरी दलील

मुस्लिम समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति को मंत्री नहीं बनाए जाने पर मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग खुश भी है। उसकी राय में मुसलमानों पर फिलहाल कोई बोझ नहीं है। इससे पहले एक व्यक्ति को मंत्री पद तो दिया गया था लेकिन वह या तो खुद अल्पसंख्यकों के लिए कोई काम नहीं करते थे या उन्हें करने नहीं दिया जाता था।

अल्पसंख्यक संस्थानों पर ग्रहण

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पिछली सरकार पर गौर करें तो एक तरफ़ जहां मदरसा बोर्ड और खास तौर से उसके चेयरमैन लगातार विवादों में घिरे रहे। उन पर कई गंभीर आरोप भी लगे। यहां तक कि बोर्ड के कई सदस्यों ने भी शिकायत की लेकिन मुख्यमंत्री मौन रहे। उर्दू अकेडमी में पिछले सेक्रेटरी के बाद से कोई फुलटाइम सेक्रेटरी नियुक्त नहीं किया गया है। बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग लगभग निष्क्रिय है। राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के साथ कैसी कैसी विचलित कर देने वाली घटनाएं हुई हैं, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग उसके खिलाफ एक दो चिट्ठी पत्री के अलावा कोई ठोस पहल करता नजर नहीं आता। पिछले दिनों पटना से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक इन्कलाब ने उसकी कार्यशैली पर एक रिपोर्ट छापी थी। दैनिक इन्कलाब ने अल्पसंख्यक वर्ग के कुछ लोगों पर हुए अत्याचार के बारे में सवाल किया था जिसका कोई जवाब नहीं दिया गया। यदि अल्पसंख्यक आयोग अल्पसंख्यकों के लिए कोई करता भी है तो एक बड़ा सवाल यह उठता है कि वह दिखाई क्यों नहीं देता।

वैशाली की घटना

अल्पसंख्यक समुदाय और खास तौर से मुस्लिम समुदाय से जुड़ा एक बहुत ही गंभीर अमानवीय घटना वैशाली जिले के देसरी थानांतर्गत चांदपुरा ओपी इलाके के रसूलपुर हबीब गांव में घटी। एक युवती को दो युवकों ने छेड़खानी का विरोध करने पर तेल छिड़क कर आग लगा दी। यह अपराध 30 अक्टूबर को शाम करीब पांच बजे अंजाम दिया गया। पुलिस और प्रशासन ने इसको कई दिनों तक दबाए रखा। अल्पसंख्यक आयोग के संज्ञान में यह मामला कब आया नहीं मालूम। लेकिन करीब हफ्ते भर पहले कुछ उर्दू समाचारपत्रों में उसका एक छोटा सा बयान जरूर छपा कि आयोग ने सख्त कार्रवाई करते हुए जिला प्रशासन को पत्र लिखा है। हमारे पास जो जानकारी है उसके अनुसार अल्पसंख्यक आयोग का कोई अधिकारी गंभीर रूप से जली पीड़िता को देखने और उसका हाल जानने के लिए पीएमसीएच नहीं गया। उस लड़की की 15 नवंबर को रात में साढ़े बारह बजे मौत हो गई। रविवार 15 नवंबर को दिन में उस लड़की के शव को सड़क पर रख कर राजधानी के कारगिल चौक पर विरोध प्रदर्शन किया गया। सोमवार, 16 नवंबर को पुलिस के आश्वासन के बाद शव को करीब एक बजे दफनाया गया। इतना सब कुछ हुआ, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग की तरफ से की गई किसी कार्रवाई का आमजन में कोई चर्चा नहीं है। इससे दो सवाल पैदा होता है। पहला यह कि क्या अल्पसंख्यक आयोग अपना काम नहीं करता और यदि करता है तो उसकी अनुशंसा पर शासन प्रशासन द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की जाती ? दूसरा सवाल यह है कि यदि अल्पसंख्यक आयोग काम नहीं करता है तो सरकार उसे नजरअंदाज क्यों कर रही है?

मंत्रालय से अधिक जरूरी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। यह सरकार का दायित्व है। खास तौर से कमजोर और वंचित समाज को सत्ता में भागीदारी तो दी ही जानी चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक यह जरूरी है कि समाज के सभी वर्गों के हितों और विकास के लिए काम किया जाना चाहिए।

जान माल की सुरक्षा

आम तौर पर अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों को यह समझाने और बताने की कोशिश की जाती है कि हमारे कारण वे सुरक्षित हैं। ऐसी सोच बदलने की जरूरत है। सरकार नागरिकों के जान माल की सुरक्षा करके कोई अहसान नहीं करती है। यह उसका कर्तव्य और दायित्व है। नागरिकों के जान माल की सुरक्षा और उन्हें सत्ता में भागीदार बनाने के लिए यदि कोई सरकार वोट देने की शर्त रखती है तो यह बहुत ही गंभीर चिंता का विषय है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *