मनरेगा मजदूरों से भी कम है बिहारवासियों की आय

बिहार की आर्थिक सर्वे रिपोर्ट में यह बताया गया है कि लोगों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय में इजाफा हुआ है लेकिन गौर से देखें तो यह मनरेगा मजदूरों से भी कम है।

शिवानन्द तिवारी

समाजवाद व्यवहारिक हो या शास्त्रीय दोनों से ध्वनि तो समता की ही निकलती है. इसलिए समता को ही कसौटी मान कर अगर बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट को देखा जाए तो क्या निष्कर्ष निकलता है ! 15 वीं (220-21) आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में 2017-18 तक के सकल घरेलू उत्पाद के जिला वार आंकड़े दिए गए हैं. सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बिहार का विकास दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार में प्रति व्यक्ति आय में इजाफा हुआ है. बिहार में प्रति व्यक्ति औसय आय ₹50735 हो गई है. जबकि राष्ट्रीय औसत ₹94954 है. प्रति व्यक्ति आय के मामले में पटना जिला सबसे आगे है और शिवहर सबसे अंतिम है. पटना हमारी राजधानी है इसलिए पटना को इसका अतिरिक्त फायदा मिल जाता है और प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह स्वाभाविक रूप से सबसे आगे हो जाता है. पटना के बाद बेगूसराय और मुंगेर का स्थान है. हालांकि पटना और बेगूसराय के प्रति व्यक्ति आय के मामले में बहुत बड़ा अंतर है. 2017-18 में पटना में प्रति व्यक्ति आय ₹112604 और बेगूसराय में 45546 ₹ और मुंगेर में ₹37385 था. वहीं शिवहर में यह प्रति व्यक्ति 17569 ₹ है.
शिवहर, बांका, अररिया, कैमूर, अरवल आदि कुछ ऐसे जिले हैं जो प्रति व्यक्ति आय के मामले में पटना या बेगूसराय के मुकाबले कहीं ज्यादा पीछे हैं. इनमें कई जिले ऐसे हैं जो प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदा के शिकार होते हैं और इस प्रकार इनकी पीड़ा और बढ़ जाती है. इन जिलों के प्रत्येक क्षेत्र में सरकार का निवेश भी बहुत कम है. इस प्रकार क्षेत्रीय गैर बराबरी बिहार में कम होने के बदले बढ़ रही है. एक तरफ हम अपने पिछड़ेपन को आधार मानकर बिहार को विशेष राज्य की श्रेणी में शामिल करने की मांग करते हैं और दूसरी तरफ अपनी आर्थिक नीति हम ऐसे चला रहे हैं जिससे हमारे यहां क्षेत्रीय विषमता घट नहीं रही है.
अगर प्रति व्यक्ति आय के बंटवारे को देखा जाए तो यह गैरबराबरी और ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है. बिहार की 70 फीसद आबादी रोजगार के मामले में कृषि और उसके सहवर्ती क्षेत्र पर निर्भर है. अगर सकल घरेलू उत्पाद को देखा जाए तो बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि और उसके सहवर्ती क्षेत्र का योगदान 18% है. इसका अर्थ हुआ कि कृषि कार्य में लगी बिहार की 70-72 फ़ीसदी आबादी की बिहार के प्रति व्यक्ति आय में महज 18% की भागीदारी है और शेष 30% आबादी को 78 फ़ीसदी प्राप्त हो रहा है. यानी कृषि और उसके सहवर्ति क्षेत्र में लगी आबादी को सालाना मात्र नौ हज़ार रू. मिल रहा है. मतलब आठ सौ रू. मासिक से भी कम.
बिहार मे मनरेगा की तय मज़दूरी 202 रू. प्रति दिन है. मनरेगा में सौ दिन की मज़दूरी 20200 रू. होती है. यानी बिहार की 70-72 फ़ीसद आबादी की मासिक आमदनी मनरेगा के सौ दिन की आमदनी के सामने भी कहीं नहीं ठहरती है. आर्थिक सर्वेक्षण ही इसको उजागर कर रहा है. क्या यही व्यवहारिक समाजवाद या सुशासनिक अर्थव्यवस्था है !!

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