उत्तर प्रदेश चुनाव और खतरे

डॉ. संजय जायसवाल

उत्तर प्रदेश का चुनाव अगले वर्ष के शुरू में होना है।
अभी से ही वहां बांटो और राज करो की कोशिश बहुत सारे दलों द्वारा देखी जा रही है।
इस देश के इतिहास में बांटो और राज करो, की बहुत बड़ी भूमिका रही है ।अंग्रेज महज 20 हजार थे और
उन्होंने 150 वर्षों तक 30 करोड़ भारतीयों पर राज किया। भारतीय ही भारतीयों के दुश्मन बन गए थे।
मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका सफल प्रयोग एक अलग देश बनाने में किया।

एक घटना जिसने बदल दिया सब कुछ

2014 में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे भारतवर्ष के राजनैतिक परिवेश को बदल दिया ।पहली बार बिखरे हुए समाज की एकता के बल पर एक ऐसी सरकार बनी जिसने समाज को अमीर और गरीब के नजरिए से देखा। उसने सारा ध्यान गरीबों के कल्याण के लिए लगाया।नतीजा 2019 मे 2014 से भी बड़े बहुमत से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी जी की वापसी हुई।
जब समाज को विभक्त करने के सारे तरीके असफल हो गए तो अब एक नया तरीका आजमाया जा रहा है।यह तरीका पाकिस्तान से सीखा गया है। पाकिस्तान जब दो बार सीधी लड़ाई में बुरी तरह परास्त हुआ तो उसने डिवाइड बाय थाउजेंड कट्स की पॉलिसी बनाई। अर्थात भारत में इतनी जगहों पर छिप कर वार करो कि भारत का विघटन हो जाए।
नागरिकता संशोधन बिल से लेकर कृषि आंदोलन में टूलकिट इसी साजिश का नतीजा है। राजनीति में इस सिद्धांत का उपयोग हैदराबाद के नेता बहुत अच्छे ढंग से कर रहे हैं। बिहार का चुनाव इनका पहला प्रयोग केंद्र बना। उन्होंने दो दलों के साथ मिलकर एक ऐसा गठजोड़ बनाया जिससे समाज को धोखा दिया जा सके कि आप अगर जुड़ जाएं तो हम इसमें जुड़कर आपको सत्ता दिला देंगे। इस साजिश से जदयू के कुछ परंपरागत वोटरों को मगध और शाहाबाद क्षेत्र में धोखा देने में वह सफल भी हो गये क्योंकि वहां इन दलों का प्रभाव क्षेत्र थोड़ा ज्यादा था।
जहां 50% से अधिक अल्पसंख्यक थे वहां उन्होंने हैदराबादी पार्टी को वोट दिया पर उसके बाहर एक वोट भी किसी को नहीं दिया गया। हैदराबादी नेता जानबूझकर बहुसंख्यक समाज के इलाकों में घूम कर लोगों को धोखा देने का काम कर रहे थे कि आप आ जाओ और हम इसमें जोड़ देंगे।
बिहार में असफल होने के बाद बंगाल मे यह प्रयोग एक दरगाह द्वारा कम्युनिस्ट और कांग्रेस के साथ किया गया। डिवाइड बाय थाउजेंड कट्स सिद्धांत के तहत इन्हें शुरू में ही समझ मे आ गया कि उर्दू भाषी हैदराबादी पार्टी से बंगाली बहुसंख्यक नहीं टूटेंगे। बंगाल चुनाव में जहां पहले दिन ही कम्युनिस्ट और कांग्रेस खत्म हो जाते वहां इस धोखे में कि नई पार्टी से अल्पसंख्यक समाज जुड़ जाएगा, पुराने परंपरागत वोटरों ने इन दोनों दलों का साथ दिया। वहां भी एक वोट दरगाह के चलते नहीं मिला पर बांटो और राज करो की पॉलिसी में सफल होकर भाजपा को सत्ता से दूर कर दिया गया। आज बहुसंख्यकों और खासकर अनुसूचित जाति पर जिस तरह के जुल्म बंगाल में ढाये जा रहे हैं वह सबके सामने हैं।
अब पुनः इसी प्रयोग की झांकी उत्तर प्रदेश मे देखने को मिल रही है। नए नए नेता उग रहे हैं कि बस हमही समाज को इंसाफ दिलाएंगे।
भाजपा सर्व समाज और सर्वहित की पार्टी है, इसलिए किसी की निजी महत्वकांक्षाएं हमारे दल में पूरी हो ही नहीं सकतीं। समाज के सभी वर्गों को यह जरूर सोचना चाहिए कि केवल जाति के नाम पर जिस नेता के पास जा रहे हैं कहीं वह एक राज्यसभा या एक विधानसभा अथवा विधान परिषद की सीट के लिए बाद में पूरे कुनबे को बेच तो नहीं देगा।
उत्तर प्रदेश चुनाव में पुनः.यह प्रयास हैदराबादी पार्टी जैसे दलों के द्वारा हो रहा है। इससे सभी को सावधान रहने की जरूरत है।

(लेखक प‌‌श्चिम चंपारण से लोकसभा सांसद और भाजपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष हैं)

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