भारत के लिए श्रीलंका से सबक

भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में लोग महंगाई और बेरोजगारी से परेशान हैं। अब तक की सबसे कठिन आर्थिक तंगी से गुजर रहे श्रीलंका के हालात कब सामान्य होंगे, पता नहीं। इसमें भारत के लिए सबक है।

संपादकीय, लिब्रेशन (जून 2022)

बढ़ती कीमतों को रोको, रोजगार दो, सांप्रदायिक साजिशें बंद करो

भारत का दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका भयानक आर्थिक संकट से कराह रहा है. इस द्वीपीय राष्ट्र पर कर्ज के भारी बोझ ने उसे अभूतपूर्व अस्तव्यस्तता में धकेल दिया है जिसके दो प्रमुख लक्षण हैं : आसमान छूती कीमतें और बुनियादी जरूरत की सामग्रियों की घोर किल्लत. श्रीलंका की जनता विद्रोह में उतर पड़ी है. वे राजपक्षे भाइयों के शासन को खत्म करना चाहते हैं, जो एक दशक से भी ज्यादा अरसे से राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के बतौर श्रीलंका की सत्ता पर काबिज हैं. राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे अपने भाई महिन्दा को प्रधान मंत्री पद से हटाकर अपनी कुर्सी बचाने की हताशोन्मत्त कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जनता का विद्रोह थमने का नाम नहीं ले रहा है.

मोदी सरकार हमें कहती है कि श्रीलंका को आर्थिक कुप्रबंधन की कीमत चुकानी पड़ रही है, लेकिन वह हमसे यह तथ्य छिपाना चाहती है कि भारतीय अर्थव्यव्यस्था में भी इसी किस्म के संकट के लक्षण दिख रहे हैं. थोक मूल्य सूचकांक में पिछले 13 महीने से लगातार दो अंकों में इजाफा दर्ज किया जा रहा है और अप्रैल माह में यह 15 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया था जो सितंबर 1991 के बाद का उच्चतम स्तर है. बढ़ती कीमतों के साथ-साथ आम जनता गायब हो रहे रोजगार और गिरती आमदनी से भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है. इस सबसे ऊपर, भारतीय रुपये का मूल्य अपने सबसे निचले स्तर तक गिर चुका है जिसका मतलब है आयात खर्चे और विदेशी कर्ज के भुगतान में लगातार वृद्धि.

श्रीलंका का कर्ज-जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) अनुपात 100 प्रतिशत के पार चला गया है. दूसरे शब्दों में श्रीलंका अपने सकल उत्पाद से ज्यादा कर्ज ले रहा है, और वह अभी-अभी पहली बार कर्ज अदायगी के मामले में डिफाल्टर बन गया है. भारत के मामले में कर्ज-जीडीपी अनुपात इससे थोड़ा ही कम है और अभी वह 85 से 90 प्रतिशत के बीच उठ-गिर रहा है. 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से लेकर अगले वर्ष (2023) के मार्च तक उनकी सरकार भारत के कुल कर्ज में 100 लाख करोड़ रुपये का भारी इजाफा कर चुकी होगी. श्रीलंका की तुलना में भारत को सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में बरतरी हासिल है, लेकिन उसमें भी क्षरण आना शुरू हो गया है. युक्रेन पर रूसी युद्ध आरंभ होने के बाद से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 36 अरब डॉलर की कमी हो चुकी है और यह समग्र भंडार 600 अरब डॉलर से नीचे चला गया है. बढ़ते व्यापार घाटे को पूरा करने के अलावा इस सितंबर माह तक 256 अरब डॉलर के बराबर कर्ज भुगतान में इस भंडार का इस्तेमाल करना होगा, जिससे वह खतरनाक स्तर तक नीचे चला जाएगा.

हमें याद रखना चाहिए कि श्रीलंका का प्रति व्यक्ति जीडीपी अभी भी भारत के मुकाबले लगभग दुगुना है, और सामाजिक-आर्थिक विकास के अधिकांश सूचकों के लिहाज से श्रीलंका भारत की बनिस्पत काफी आगे रहा है. अगर आज श्रीलंका इस भयानक अस्तव्यस्तता में फंसा है, तो ऐसा कोविड महामारी के कारण शुरू हुए और युक्रेन युद्ध के चलते बढ़ गए किसी अचानक के आर्थिक विघटन का नतीजा नहीं है. इसकी जड़ें छोटे पैमाने के घरेलू उत्पादन और आम जनता की उपभोग की जरूरतों की वर्षों से हुई उपेक्षा में निहित हैं, जबकि वहां का शासन बड़ी-बड़ी इंफ्रास्टक्चर (बुनियादी ढांचा) परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम कर्ज लेता रहा जो कि कॉरपोरेट-परस्त, साम्राज्यवाद-परस्त और जनविरोधी नव-उदारवादी आर्थिक मॉडल के अंग हैं जिसे श्रीलंका ने दक्षिण एशिया में सबसे पहले अपनाया था.

भारत भी उसी गतिपथ में फंसा हुआ है. बड़ी परियोजनाओं के नाम पर तड़क—भड़क वाला आडंबरपूर्ण और थोथा मीडिया प्रचार विकास के मोदी मॉडल को परिभाषित करते हैं. लेकिन वास्तविकता में, बहुत कम नई परिसंपत्तियां सृजित की जा रही हैं जबकि जनता के पैसे से दशकों के दौरान निर्मित की गई सार्वजनिक परिसंपत्तियों को कौड़ी के मोल अडानी-अंबानी सरीखे लोग हथिया ले रहे हैं. जहां मुख्य परिसंपत्तियां और इंफ्रास्टक्चर कुछ गिने-चुने क्रोनियों (पिट्ठू पूंजीपतियों, शासकों के भाई-भतीजों) के हाथों में केंद्रित हो रहे हैं, वहीं मंझोले व लघु क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं जिसके चलते औद्योगिक वृद्धि और रोजगार अत्यंत निम्न स्तर पर गिरते चले जा रहे हैं. दिसंबर 2021 में संसद में सरकार की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार 2015 के बाद से कुल मिलाकर 8,81,254 भरतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी है. इनमें बड़ी संपत्तियों वाले लोग भी काफी तादाद में शामिल हैं. व्यापक पैमाने के इस बहिर्गमन को आर्थिक गिरावट के माहौल और साथ ही, बढ़ती सांप्रदायिक नफरत — जो मोदी युग का दूसरा मील का पत्थर है — के नतीजे के तौर पर ही व्याख्यायित किया जा सकता है.

कृषि ही वह एकमात्र क्षेत्र था जो पूरे कॉरपोरेट चंगुल में आने से बचा हुआ था और जिसमें लॉकडाउन व महामारी के दौरान भी कुछ सकारात्मक वृद्धि हुई थी, जबकि अन्य क्षेत्र तो पूरी तरह से अवरुद्ध हो गए थे. अब हालांकि किसानों के प्रतिरोध ने सरकार को वे तीन कानून वापस लेने को बाध्य कर दिया है जो कृषि के पूर्ण कॉरपोरेट अधिग्रहण को सहज करने के लिए बनाये गए थे, किंतु कॉरपोरेट हितों के पक्ष में कृषि के पुनर्विन्यास की प्रक्रिया बेरोकटोक जारी है. खाद्यान्न उत्पादन से नगदी फसलों के उत्पादन की ओर एक खतरनाक विचलन दिख रहा है जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है.

जनता के विद्रोह का मतलब यह है कि ये राजपक्षे भाई अब श्रीलंका की जनता को अपनी मुट्ठी में बंद करके नहीं रख सकते हैं और श्रीलंकाई तमिलों व मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा व उत्पीड़न का अभियान चलाकर जीवनयापन की जरूरतों तथा आम जनता के अधिकारों के बुनियादी मुद्दों से अवाम का ध्यान नहीं भटका सकते हैं. भारत में सरकार न केवल आम लोगों के सभी हितों से हठपूर्वक इन्कार कर रही है, बल्कि वह जनता पर विभाजनकारी व विध्वंसकारी एजेंडा थोपकर उन्हें और भी ज्यादा चोट पहुंचाने और उनका अपमान करने में मशगूल है. जहां अर्थतंत्र तेजी से तबाह हो रहा है और खाद्य पदार्थों, ईंधन व अन्य बुनियादी जरूरतों की कीमतें सर से ऊपर जा रही हैं वहीं सरकार गरीबों, खासकर मुस्लिमों के घरों व आजीविका के साधनों पर बुलडोजर चलवाने, और मंदिरों की खोज व निर्माण करने के नाम पर मस्जिदों और मकबरों को खुदवाने में जुटी हुई है.

यह विभाजनकारी और विध्वंसकारी मुहिम उत्तर प्रदेश में भाजपा को फिर से मिली जीत के बाद खतरनाक ढंग से बढ़ गई है. पर्व-त्योहारों को आक्रामक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रदर्शनों में बदल दिया गया है, और एक के बाद दूसरे राज्य में मुस्लिम घरों व दुकानों पर बुलडोजर चलाये जा रहे हैं. काशी और मथुरा से लेकर ताजमहल और कुतुब मीनार तक, संघ ब्रिगेड के हुड़दंगी हर जगह इतिहास को हड़पने के लिए तैयार हो रहे हैं. हिजाब पहनने वाली मुस्लिम छात्राओं को उच्च शिक्षा तक पहुंचने से रोकने के बाद, कर्नाटक की भाजपा सरकार अब राज्य के शैक्षिक संस्थानों में बजरंग दल के लिए खुले हथियार प्रशिक्षण शिविरों की इजाजत दे रही है.

भारतीय लोकतंत्र के इस संकटपूर्ण मोड़ पर न्यायपालिका, जिसे हमारे लोकतांत्रिक गणतंत्र में संवैधानिक कानून के राज का प्रहरी माना जाता है, कार्यपालिका का पक्ष लेने की ओर अधिकाधिक प्रवृत्त होती दिख रही है. इसीलिए सारा दारोमदार ‘हम, भारत के लोग’ पर आ रहा है, जिन लोगों ने संविधान को अपनाकर भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाने का, और तमाम विपरीत परिस्थितियों में उसे बुलंद रखने का संकल्प लिया है. सरकार से यह साफ-साफ जोरदार ढंग से कहने का वक्त आ गया है कि या तो वह कीमतों पर लगाम लगाये और रोजगार दे, या फिर गद्दी छोड़ दे. हमारे वर्तमान पर आघात पहुंचाने के लिए मनगढ़ंत अतीत को पेश करने की साजिश को दृढ़तापूर्वक ‘नहीं’ कहने का समय आ गया है.

लिबरेशन, भाकपा माले की मासिक पत्रिका है। यह सीपीआईएमएल का केंद्रीय अंग है। इसके मुख्य संपादक दीपांकर भट्टाचार्य हैं।

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