मीरा मिश्रा की कहानियों का अनुभव जगत बहुत व्यापक है: तरुण कुमार

पटना। मीरा मिश्रा के प्रथम संग्रह ‘प्रीत तुम्हारे संग’ का लोकार्पण समारोह विधान परिषद सभागार में सम्पन्न हुआ। लोकार्पण करने वालों में प्रमुख थे बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर तरुण कुमार, कथाकार सन्तोष दीक्षित, कथाकार शिवदयाल, आलोचक सुनीता सृष्टि, राम उपदेश सिंह विदेह आदि। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, बुद्धिजीवी, रँगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता था विभिन्न जनंगठनों के लोग मौजूद थे। इस लोकार्पण समारोह का संयुक्त आयोजन एसोसिएशन फॉर स्टडी एंड एक्शन (आसा), ‘अभियान सांस्कृतिक मंच’ और ‘आयाम-साहित्य का स्त्री स्वर’ द्वारा किया गया था।
उनका परिचय देते हुए संचालक अनिल कुमार राय ने कहा ” मीरा मिश्रा की पढ़ाई इलाहाबाद विश्विद्यालय से हुई वहीं से छात्र संगठन एस. एफ.आई से जुड़ाव हुआ बाद में 1Jइन्होंनेकई पत्र-पत्रिकाओं जैसे हंस, जनशक्ति आदि में आलेख लिखे। ‘प्रीत तुम्हीं संग’ में 27 कहानियां हैं जिसे उन्होंने कोरोना काल के दौरान लिखा है। ”
बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने अपने संबोधन में कहा ” किताब लिखते समय कुछ न कुछ भावना होती है। ‘हार की खुशी’ के कहानी मुझे पसन्द है। की कैसे चुनाव में पार्टी के एयर से जो पैसा मिलता है तो चुनाव लड़ने वाला जीत जाता है। इनकी कहानियों में अनुभव की कहानियां हैं।”
पटना विश्विद्याल में हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर तरुण कुमार ने कहा ” मीरा मिश्रा की कहानी विमर्श आदि आए जुड़ी फार्मूलाबद्ध कहानी नहीं है। कहानी में यदि विचार पकड़ में आ जाये तो इसका मतलब वह कमजोर कहानी है। कहानी हिंदी की लोकतांत्रिक विधा है। सबलोग चाहते हैं कि उनके जीवन के बाद उनकी कहानी सुनाई जाए। कहानी में आप कनेक्ट कैसे करते हैं यह महत्वपूर्ण होता है। अपनी समझदारी को व्यक्त करने का माध्यम है कहानी है। मीरा मिश्रा का अनुभवलोक व्यापक है। ‘ प्रीत तुम्हीं संग’ संग्रह की टाइटल कहानी है। रिश्तों की जीवंतता का प्रतीक है ‘प्रीत तुम्हीं संघ’। जिस दाम्पत्य रिश्ते में यदि तकरार न हो इसका मतलब उसमें काव्य रस नहीं है। साहित्य हमें विस्मृति से बचाती है। गुलाब बाई का थियेटर पढ़ते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानी ईदगाह की याद आ जाती है। कुछ कहानी रिपोर्ताज शैली में लिखी गई है। कुछ कहानियों में हकीकत अधिक फसाना कम है। ‘खेला’ कहानी भी मुझे प्रिय है।”
लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कथाकार सन्तोष दीक्षित ने कहा “मीरा मिश्रा ने कहानियां डिक्लास करते हुए लिखी हैं। ग्रामीण सौंदर्य का गहरा चित्र है। कहानियां पढ़ते हुए आज के समय के प्रति गहरी निराशा व क्षोभ है का अहसास होता है। कहानियों में भाषा व कहन के स्तर पर अनूठापन है। बड़ी रचना तभी होती है जब लेखक समाज से टकराता है। उसमें बदलाव लाना चाहता है। इनकी कहानियों में विविधता है, कई तरह के पात्र हैं। ‘प्रीति तुम्हीं संघ’ एक बांझ स्त्री की कहानियां है जबकि नैरेटर उसकी गांव की औरत है। उसका बांझपन उसके पति के कारण है। पति चाहता है कि उसकी पत्नी गर्भवती हो जाए इसके लिए। यह कहानी दांपत्य जीवन के कहानी है। राजेन्द्र यादव कहा करते थे कि कहानियां हमेशा चरित्रहीन स्त्रियों की होती है। दाम्पत्य जीवन की एक और कहानी ‘चिट्ठी’ है। उसका ‘गुनाह’ सुहेल और फातिमा जैसे पात्र वाली कहानी में हिन्दू-मुसलमान के रिश्तों, मॉब लींचिंग जैसे विषय उठाए गए हैं।”
सुनीता सृष्टि ने ‘प्रीत तुम्हीं संघ’ पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा “मीरा मिश्रा एक परिपक्व व समझदारी भरी टिप्पणियां करती हैं। इनकी कुछ कहानियां रिपिर्ताज के शैली में लिखी गई है। उनकी कहानियां रपटीली हैं। वे कहानी के साथ कविता भी लिखती हैं। कहानी लिखना मतलब उद्देश्य व मनोरंजन दोनों होता है। आज के समय में प्रतिरोध के स्वर को प्रमुखता दी जाती है। इनकी कहानियां इक्कसवीं सदी की कहानियां हैं। इनकी कहानियों से स्त्री-पुरुष का भेद मिटा प्रतीत होता है। उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का चित्र लेकर आती हैं।”
कथाकार शिवदयाल ने मीरा मिश्रा की कहानियों के बारे में विचार प्रकट करते हुए कहा “इनका लोकेशन ग्रामीण परिवेश है। परिवेश का जो यथार्थ आता है, जो भाषा व मुहावरे हैं जो दृश्यबिंब हैं। जिनके जीवन स्थितियां पूर्वांचल के गांवों की हैं। संयुक्त परिवारों की जकड़न, मर्यादा भंग तथा गीली लकड़ी सा सुलगता स्त्री जीवन है। संग्रह की कहानियों का दूसरा सेट शहरी मध्यवर्ग की कहानियां हैं। पात्रों, परिस्थितियों की प्रामाणिकता है। तीसरा सेट व्यंग्य है। कहानियों में रूढ़िग्रस्त समाज से लेकर तकनीक चालित समाज है। कुछ कहानियां बदलते समय के साथ संगति बिठाने की कोशिश की गई है।”
प्रगतिशील लेखक संघ के उपमहासचिव अनीश अंकुर ने कहा ” मीरा मिश्रा जब भी ग्रामीण जीवन की कहानियां लिखती हैं तो सिर्फ सैलानी की निगाह से नहीं देखती बल्कि उसके दुःख-तकलीफ में हिस्सा लेती प्रतीत होती है। सरयू की गोद में, चिट्ठी, लड़की, खेला, कलयुग कहानियां महत्वपूर्ण हैं। इन कहानियों के मूल्य बेहद लोकतांत्रिक हैं। कहानियों में कहानीकार वैचारिक दौलत को अपने रचनात्मक दौलत में तब्दील करने की जद्दोजहद करती प्रतीत होती हैं।”
कहानीकार मीरा मिश्रा ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा “मैं मूलतः विज्ञान की छात्रा थी परंतु पढ़ने-लिखने का शौक बचपन से रहा है। कहानियां सुनने व लिखने का शौक रहा। मेरी बेटी कहानी सुनकर ही खाती थी। मेरी पांचवीं कक्षा तक गांव में पढ़ा था। साठ के दशक का गांव मैंने देखा था। कैसे गांवों का शहरीकरण, बजारीकरण हो रहा है। वह चिंतित करता है। इसी के कारण संस्मरण के रूप में कुछ कहानियां लिखी थीं। मुझे शुरू में पता न था कि कैसे कोई बात लिखी जाए कि वह कहानी, रिपोर्ताज बन जाये। कोरोना के समय इन सभी कहानियों को लिखा था। मेरी कोशिश थी कि जिस समय की कहानी है उसस परिवेश व चरित्र का रेखांकन ठीक से हो। अधिकांश कहानी स्त्री आधारित है।”
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए पदमश्री उषाकिरण खान ने कहा ” मीरा मिश्रा को आलेख लिखते, संपादन करते देखा करती थी लेकिन अंततः वे कहानी पुस्तक लिखने में सफल हो पाएं। स्त्री-पुरुष के देखने का तरीका अलग हो जाता है। जब तक स्त्री अपने दैनिन्दन कामों से अलग नहीं होगी तब तक कलम लेकर नहीं बैठ सकतीं तथा कहानी नहीं लिख सकतीं। मैं आशा करती हूं कि समीक्षक मित्रों ने जो पढा है उन्हें पता होगा व्यंग्य बहुत अच्छा करती हैं। मीरा मिश्रा व्यंग्य का एक अच्छा उपन्यास लिख सकती हैं।”
लोकार्पण समारोह को पूर्व प्रशासनिक पदाधिकारी रामउपदेश सिंह विदेह ने भी संबोधित किया।
समारोह का संचालन आसा के अनिल कुमार राय ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन ‘अभियान सांस्कृतिक मंच’ के गजेंद्रकांत शर्मा ने किया।
समारोह में बड़ी संख्या में पटना के साहित्य व नागरिक समाज के प्रतिनिधि मौजूद थे। प्रमुख लोगों थे अवकाशप्राप्त प्रशासनिक पदाधिकारी व्यास जी मिश्रा, बिहार सूचना आयुक्त त्रिपुरारी शरण, रंगकर्मी जयप्रकाश, चित्रकार प्रमोद, विश्विद्यालय व महाविद्यालय कर्मचारियों के नेता प्रो अरुण कुमार, डॉ अंकित कांग्रेस के विधायक शकील अहमद खान, चंद्रकांता खान, ए. एन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के विद्यार्थी विकास, अन्विता प्रधान, उषा झा, गोपाल शर्मा, सरोज, इरफान अहमद फ़ातमी, अर्चना त्रिपाठी, मुसाफिर बैठा, चंद्रभूषण, पूर्व डीजीपी डी. एन गौतम, राष्ट्रीय सहारा के पूर्व संपादक चंदन, पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य रघुनन्दन शर्मा, प्रदीप कुमार, नन्दकिशोर सिंह, प्रदीप प्रियदर्शी, मिर्जा कॉलेज की सहायक प्राध्यापक मधुबाला, सुनील सिंह, उमा कुमार, अवकाशप्राप्त पुलिस पदाधिकारी राज्यवर्द्धन शर्मा, पत्रकार नवेन्दु, चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी, डॉ गोपाल शर्मा, कुलभूषण गोपाल, इंद्रनाथ झा, सुशील कुमार भारद्वाज, रत्ना पुरकायस्थ, अजय कुमार, पप्पू ठाकुर, डॉ. शैलेन्द्र आदि ।

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